भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर चल रही अनिश्चितताओं के बीच एक बड़ी खबर सामने आई है। क्या डील में अभी और देरी होगी? इस सवाल का जवाब देते हुए वाणिज्य सचिव ने स्पष्ट कर दिया है कि बातचीत का दौर अब खत्म हो चुका है और डील ‘फाइनल’ हो गई है। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने सोमवार को बताया कि भारत और ईयू ने प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते के लिए बातचीत सफलतापूर्वक संपन्न कर ली है।
उन्होंने कहा, ‘डील फाइनल हो चुकी है’ अक्सर व्यापार समझौतों में बातचीत के अंतिम चरण सबसे जटिल होते हैं, लेकिन वाणिज्य सचिव ने साफ शब्दों में कहा, “बातचीत सफलतापूर्वक संपन्न हो गई है। सौदा फाइनल हो गया है”। उन्होंने इस समझौते को भारत के नजरिए से “संतुलित और भविष्य को ध्यान में रखने वाला” बताया है। उम्मीद जताई जा रही है कि यह समझौता दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच बेहतर आर्थिक एकीकरण में मदद करेगा और व्यापार व निवेश को नई गति देगा।
सचिव ने बताया कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की वार्ता संपन्न हो गई है, इसकी घोषणा कल की जाएगी। कानूनी जांच के बाद औपचारिक रूप से समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। अग्रवाल ने कहा, “यह समझौता संतुलित, दूरदर्शी होगा और यूरोपीय संघ के साथ बेहतर आर्थिक एकीकरण में सहायक होगा। इससे दोनों पक्षों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिलेगा। यह समझौता अगले वर्ष लागू होगा। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने बताया कि समझौते के पाठ की कानूनी जांच में 5-6 महीने लगेंगे और उसके बाद औपचारिक हस्ताक्षर किए जाएंगे।”
तो हस्ताक्षर में वक्त क्यों?
अगर डील फाइनल हो गई है, तो इसे लागू होने में वक्त क्यों लग रहा है? वाणिज्य सचिव ने जानकारी दी कि वर्तमान में एफटीए टेक्स्ट की ‘लीगल स्क्रबिंग’ चल रही है। (व्यापारिक भाषा में, ‘लीगल स्क्रबिंग’ वह प्रक्रिया है जहां वकील और कानूनी विशेषज्ञ मसौदे की समीक्षा करते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कानूनी भाषा सटीक है और भविष्य में कोई विवाद न हो।)
कब लागू होगी डील?
राजेश अग्रवाल ने बताया कि सरकार का प्रयास प्रक्रियाओं को तेजी से पूरा कर जल्द से जल्द एक तारीख पर समझौते पर हस्ताक्षर करने का है।
• हस्ताक्षर कब: इस समझौते पर इसी साल हस्ताक्षर होने की उम्मीद है।
• अमल कब होगा: यह समझौता अगले साल की शुरुआत में लागू हो सकता है।
वाणिज्य सचिव का यह बयान भारतीय उद्योग जगत के लिए एक बड़ा संकेत है कि अब नीतिगत बाधाएं दूर हो चुकी हैं, और बस अंतिम औपचारिकताओं का इंतजार है। यह डील भारत के मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के लिए यूरोपीय बाजारों के दरवाजे और चौड़े करेगी।