फिल्मों की चमक के पीछे मजदूरों की चीखें दब रहीं: बीएन तिवारी, FWICE अध्यक्ष
‘फिल्मों की चमक पीछे छोड़ दीजिए। यहां मजदूर महीनों तक अपने ही पैसे का इंतजार करते हैं। समय पर भुगतान को कानून बनाकर लागू करना होगा, वरना शोषण कभी खत्म नहीं होगा। कागजों में बारह घंटे की काम सीमा लिखी है, लेकिन कई सेटों पर लोग सोलह से अठारह घंटे तक काम करते हैं। यह पूरी तरह गलत है। सेट पर मेडिकल सुविधा और बीमा बेहद जरूरी है। मजदूर रोज इस डर में काम करते हैं कि वे सुरक्षित घर लौट पाएंगे या नहीं। सरकार सबसे ज्यादा टैक्स इसी इंडस्ट्री से लेती है, तो मजदूरों का कल्याण कोष कहां है। अगर ये व्यवस्थाएं नहीं सुधरीं तो पहले मजदूर टूटेंगे और फिर पूरी इंडस्ट्री कमजोर पड़ जाएगी। अब सरकार के पास सुनने का नहीं, कार्रवाई का समय है।’
बजट में हमेशा सिनेमा की अनदेखी होती: अक्षय राठी
‘यूनियन बजट में हमारी इंडस्ट्री का नाम मुश्किल से आता है, जबकि प्रधानमंत्री खुद सिनेमा को भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ कहते हैं। सरकार को ऐसी नीतियां लानी चाहिए, जो सच में इस इंडस्ट्री को आगे बढ़ाएं। कस्टम ड्यूटी और टैक्स कम किए जाएं ताकि नए प्रोजेक्टर और उपकरण सस्ते मिल सकें और अधिक सिनेमाघर बन पाएं। कई राज्यों ने पहले भी सब्सिडी दी, पर नियम इतने मुश्किल थे कि किसी ने फायदा नहीं उठाया। देश में सिर्फ 9,200 के आसपास स्क्रीन हैं। बड़ी फिल्मों के आने पर मिड-बजट फिल्मों को जगह ही नहीं मिलती। अगर स्क्रीन बढ़ेंगी तो हर फिल्म को बराबर मौका मिलेगा और इंडस्ट्री आगे बढ़ेगी।’
भारत में स्वतंत्र फिल्म बनाना कठिन: संजय गुलाटी
‘भारत में स्वतंत्र फिल्म बनाना बहुत कठिन काम है। यूरोप में सरकारें फिल्म की शुरुआत में ही आर्थिक मदद दे देती हैं, इसलिए कलाकार बिना दबाव के काम कर पाते हैं। भारत में सहायता अक्सर फिल्म रिलीज होने के बाद मिलती है, जबकि जरूरत सबसे ज्यादा शूटिंग के समय होती है। पहले एनएफडीसी कला फिल्मों को समर्थन देता था, लेकिन अब वह माहौल लगभग खत्म हो चुका है। इंडी फिल्ममेकर फंडिंग की कमी, सही तकनीकी टीम न मिलने, महंगे उपकरण, लोकेशन परमिट की दिक्कत, स्क्रीन न मिलना और मार्केटिंग के लिए पैसे न होने के कारण जूझते रहते हैं। अगर शुरुआत से ही आर्थिक सहायता देने वाला राष्ट्रीय फंड नहीं बना, तो ईमानदार और बहादुर कहानियां धीरे-धीरे गायब हो जाएंगी और इंडियन सिनेमा की असली आवाज कमजोर पड़ जाएगी।’
इंडस्ट्री अर्थव्यवस्था में योगदान देती है, पर बजट में नहीं मिलती जगह: शब्बीर बॉक्सवाला, प्रोड्यूसर
फिल्म इंडस्ट्री ने पिछले कुछ साल में जितनी मुश्किलें झेली हैं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ। जीएसटी और कई तरह के टैक्स ने फिल्में बहुत महंगी कर दी हैं। हमारी इंडस्ट्री देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती है, लेकिन बजट में हमारी समस्याओं को कभी सही जगह नहीं मिलती। ऐसा लगता है कि सरकार मानकर चलती है कि फिल्मों को मदद की जरूरत नहीं है, जबकि सच यह है कि इंडस्ट्री को तुरंत राहत चाहिए। अब समय सिर्फ सुनने का नहीं, ठोस कदम उठाने का है। अगर सरकार ने इस बार कोई फैसला नहीं लिया तो बहुत से लोग यह काम छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे।