राष्ट्रीय राजधानी में ‘एआई इम्पैक्ट समिट’ की शुरुआत हो चुकी है। पांच दिन के इस ग्लोबल इवेंट में एआई के मुद्दे पर तकनीकी विमर्श हो रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों के दिग्गज इस विषय पर अपनी राय रख रहे हैं। समिट के पहले दिन सोमवार को ‘एआई एंड मीडिया: अपॉर्च्युनिटीज, रिस्पॉन्सिबल पाथवेज एंड द रोड अहेड’ विषय पर सत्र हुआ। इसका नॉलेज पार्टनर डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) था, जो भारत की शीर्ष प्रकाशक समूहों की डिजिटल इकाइयों का संगठन है। सत्र में अमर उजाला समूह के प्रबंध निदेशक तन्मय माहेश्वरी, इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस-चेयरपर्सन कली पुरी, दैनिक भास्कर ग्रुप के उप प्रबंध निदेशक पवन अग्रवाल, बेनेट कॉलमैन ग्रुप के सीओओ मोहित जैन, द हिंदू समूह के सीईओ नवनीत एलवी, इंटरनेशनल न्यूज मीडिया एसोसिएशन के डिजिटल प्लेटफॉर्म इनीशिएटिव के हेड रॉबर्ट व्हाइटहेड और ईवाई समूह के आशीष फेरवानी ने हिस्सा लिया।
एआई किसी का विकल्प नहीं
अमर उजाला समूह के प्रबंध निदेशक तन्मय माहेश्वरी ने कहा, ”हमारे लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक तकनीक की तरह ही है। किसी भी दूसरी तकनीक के अच्छे और बुरे, दोनों पहलू होते हैं। इसका क्लासिक उदाहरण परमाणु प्रौद्योगिकी है। इससे दुनिया का सबसे खतरनाक बम भी बन सकता है और दूसरी तरफ यह ऊर्जा के सबसे स्वच्छ स्रोतों में से एक भी है। एआई के साथ भी कुछ ऐसा ही है। सवाल यही है कि आप इसका इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। आपको इसके साथ हमेशा इंसानों को जोड़ना होगा। अमर उजाला में हम व्यापक दृष्टिकोण लेकर चलते हैं। हम टियर-टू, टियर-थ्री शहरों में मौजूद पाठकों और वहां से आ रही खबरों पर जोर देते हैं। इंसान जो काम करते हैं, एआई का इस्तेमाल उसकी मदद करने के लिए हो सकता है ताकि कंटेंट में और गहराई लाई जा सके और उसकी सामग्री को बेहतर बनाया जा सके। इसलिए हम एआई को किसी भी चीज का विकल्प नहीं मानते।”
उन्होंने कहा, ”हम एआई को खबरों की गुणवत्ता बेहतर करने के एक साधन के रूप में देखते हैं। आखिर में हमारा लक्ष्य अपने यूजर के लिए और बेहतर कंटेंट तैयार करना है। हम कभी यह नहीं मानते कि एआई किसी की जगह ले लेगा। इस पूरे एआई इंजन में कंटेंट की लेयर सबसे महत्वपूर्ण परत है। इसके अलावा डेटा लेयर, प्रोसेसिंग लेयर, एप्लिकेशन लेयर और पावर-एनर्जी लेयर भी शामिल हैं। लेकिन कंटेंट लेयर ही इकलौती ऐसी परत है, जो बदलती रहती है। एक जिम्मेदार संगठन के रूप में हमारा मानना है कि हमें इसी परत का उपयोग अपनी कंटेंट प्रोडक्शन प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए काम करना चाहिए। आमतौर पर इसके उपयोग के उदाहरणों में कंटेंट की गहराई बढ़ाना, एक जैसे और बार-बार दोहराए जाने वाले काम को ऑटोमेट करना और उससे बचाए गए समय का इस्तेमाल ज्यादा शोध-आधारित और गुणवत्तापूर्ण कार्यों के लिए करना शामिल है।”

‘दुनिया हमें सौंपी गई है, हमें इसे बेहतर रूप में आगे सौंपना है’
इस सवाल पर कि जब भारतीय भाषाओं में एआई मॉडलों का इस्तेमाल करते हैं, तो क्या संदर्भ सही तरह से काम करता है? इसके जवाब में तन्मय माहेश्वरी ने कहा, ”नहीं। इसलिए मैं कहूंगा कि भाषाओं पर आधारित मॉडलों में सटीकता 50-55% से भी कम रहती है। इस बारे में सैम ऑल्टमैन का एक बहुत प्रसिद्ध कथन भी है। वो कहते हैं कि एआई हमें दुनिया के अंत तक ले जा सकता है, लेकिन तब तक हम कुछ बेहतरीन कंपनियां जरूर बना लेंगे। …अब यह हम सभी के लिए एक तरह का डार्क ह्यूमर हो सकता है, लेकिन जब भी हम कुछ नया बनाते हैं, तो वह भविष्य के लिए, अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए होता है। हम तो केवल संरक्षक हैं। यह दुनिया हमें सौंपी गई है और हमें इसे बेहतर और संतुलित रूप में आगे सौंपना है।
एआई पर तेजी से अमल के कई तरीके
चर्चा के आखिरी चरण में तन्मय माहेश्वरी ने कहा, ”देश में एआई पर अमल कुछ बिंदुओं के जरिए होगा। पहला- क्या सरकार और बड़ी टेक कंपनियां ओरिजिनल और सत्यापित कंटेंट के स्रोत को लेबल कर सकती हैं और उसके लिए एक डिजिटल सिग्नेचर बना सकती हैं? यह काम अपेक्षाकृत आसानी से किया जा सकता है खासकर जब इसके लिए ब्लॉकचेन तकनीक का उपयोग किया जाए। दूसरा बिंदु है- ट्रेसेबिलिटी यानी स्रोत की स्पष्ट पहचान। जब यह पता हो कि कोई कंटेंट कहां से आया है, तो जरूरत पड़ने पर हम उस व्यक्ति या स्रोत तक पहुंच सकते हैं। इससे दूसरों को भ्रमित करने की कोशिशों का जोखिम कम होगा, क्योंकि लोगों को पता होगा कि उनकी पहचान सामने आ सकती है।”
उन्होंने कहा, ”तीसरा बिंदु है- उभरते हुए भारतीय मॉडलों में डेटा की उपलब्धता। समस्या यह है कि ज्यादातर पश्चिमी मॉडलों के पास भारत से जुड़ा डेटा ही नहीं है। हमारे यहां स्वास्थ्य सेवाओं का समग्र डिजिटल डेटा नहीं है। सार्वजनिक परिवहन का व्यवस्थित डेटा नहीं है। रेगुलेटरी डेटा सुव्यवस्थित रूप में नहीं है। यहां तक कि आपराधिक रिकॉर्ड का भी व्यापक डिजिटलीकरण नहीं हुआ है। जब डेटा ही उपलब्ध और डिजिटाइज्ड नहीं होगा, तो किसी मॉडल को उस पर प्रशिक्षित कैसे किया जा सकेगा? सरकार को इन मॉडलों और संबंधित ढांचे को सभी भारतीय संगठनों के लिए उपलब्ध कराना चाहिए, ताकि हम उस पर आगे कुछ बना सकें और उसे प्रशिक्षित कर सकें।”
”आखिरी बिंदु है- इंफ्रास्ट्रक्चर। एआई का बुनियादी ढांचा सरकार को ही तैयार करना होगा। सड़कों का निर्माण कौन करता है? बांध कौन बनाता है? हाईवे और हवाई अड्डे शुरुआत में किसने बनाए? परंपरागत रूप से सरकार ही आधारभूत संरचना की शुरुआत करती है। फिर जनता उसका इस्तेमाल करती है। बाद में निजी क्षेत्र उसमें प्रवेश करता है और उसे आगे बढ़ाता है। चीन इसका एक बड़ा उदाहरण है। वहां सरकार ने बड़े पैमाने पर निवेश किया है। आज जिस एआई परिवेश या उत्साह को हम यहां देख रहे हैं, इस समिट के लिए लंबी कतारें नजर आ रही हैं, यह भी इसी तरह के शुरुआती सरकारी निवेश और ढांचे के कारण संभव हुआ है। लोगों की जो उत्साहपूर्ण भागीदारी दिखाई दे रही है, वह इस देश की रुचि और सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।”
‘पानी के ऊपर सीधे मलाई नहीं टिकेगी’
उन्होंने कहा, ”उम्मीद है कि यह छोटा-सा कदम आगे चलकर एक बहुत बड़ी छलांग में बदलेगा, लेकिन भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर के बिना और सरकार द्वारा पर्याप्त डेटा उपलब्ध कराए बिना केवल भारतीय मॉडल की बात करना व्यावहारिक नहीं है। पहले बुनियादी ढांचा तैयार करना होगा, उसे मजबूत करना होगा। उसके बाद ही उस पर उत्कृष्टता की परत चढ़ाई जा सकती है। यह वैसा है, जैसे पानी के ऊपर सीधे मलाई नहीं टिक सकती, उसे जमने के लिए आधार चाहिए। वैसे ही मजबूत आधार के बिना श्रेष्ठ परिणाम संभव नहीं है।”
‘बड़ी टेक कंपनियां हमारे उपभोक्ताओं के दम पर आगे बढ़ रहीं’
उन्होंने कहा, ”भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना ही सबसे महत्वपूर्ण है। इस पूरे परिदृश्य में एक तरफ बड़ी टेक कंपनियां हैं, जो साफ तौर पर मुनाफे की स्थिति में हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था विश्व जीडीपी में लगभग 26% योगदान देती है, लेकिन वैश्विक शेयर बाजार सूचकांक में उसका योगदान लगभग 65% है। यह उन कंपनियों का मूल्यांकन है, जो हमारे उपभोक्ताओं के आधार पर आगे बढ़ रही हैं। यदि समय रहते संतुलन नहीं बनाया गया, तो नुकसान केवल मीडिया कंपनियों को ही नहीं होगा, सबसे बड़ा नुकसान उपभोक्ताओं को होगा। जैसे हमें साफ हवा, साफ पानी, अच्छा भोजन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार है, वैसे ही हमें सही, सटीक और अपनी पसंद की जानकारी प्राप्त करने का भी अधिकार है।
‘लोगों के पास बेहतर विकल्प होने चाहिए’
तन्मय माहेश्वरी ने कहा, ”उदाहरण के लिए, हम लोगों को यह मानने के लिए बाध्य नहीं कर सकते कि हाथी के पांच पैर होते हैं। हम लगातार एक इन्फॉर्मेशन बबल में नहीं रह सकते। इसलिए उपभोक्ता को सर्वोच्च मानते हुए पूरी संगठनात्मक नीति, नीतिगत ढांचा, नियामक ढांचा और बड़ी टेक कंपनियों के साथ साझेदारी इसी उद्देश्य से तैयार की जाए। आखिरकार समाधान उपभोक्ता के हित में होना चाहिए। मीडिया उद्योग सामान्य वर्कप्लेस नहीं है। यह न तो किसी होटल की तरह है और न ही किसी फैक्ट्री की तरह। हम बेहद जिम्मेदार पेशे से जुड़े हैं और देश के बेहतर भविष्य के प्रति हमारी जवाबदेही है। बेहतर भविष्य के लिए यह जरूरी है कि लोगों के पास बेहतर विकल्प हों। ऐसे विकल्प हों, जिनमें वे अपनी पसंद का कंटेंट चुन सकें, न कि ऐसे विकल्प, जिसमें उन्हें वैश्विक एजेंडों के अनुसार गुमराह किया जाए।
* इंडिया टुडे ग्रुप की उपाध्यक्ष कली पुरी ने कहा कि एआई तकनीक का इस्तेमाल हमेशा मानवीय परत (ह्यूमन लेयर) के साथ होना चाहिए। एआई का उद्देश्य मानव काम की मदद करना और सामग्री की गुणवत्ता बढ़ाना होना चाहिए, न कि किसी की जगह लेना। उन्होंने डिजिटल साम्राज्यवाद पर चिंता जताई और कहा कि बड़ी तकनीकी कंपनियां भारतीय मीडिया को अमेरिकी मीडिया जैसी सुविधा नहीं देती हैं। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि भारतीय मीडिया को समान अधिकार दिए जाएं। उन्होंने सोवरेन इंडिया स्टैक की जरूरत पर जोर दिया ताकि वैश्विक टेक दिग्गजों के सामने भारत की अपनी ताकत और नियंत्रण रहे। उन्होंने चेताया कि अगर हम आज अपनी सामग्री और डेटा की सुरक्षा नहीं करेंगे, तो भविष्य में इसका मूल्य बहुत महंगा होगा।
*बेनेट कॉलमैन ग्रुप के सीओओ मोहित जैन ने कहा कि एआई क्रांति सभी क्रांतियों की जननी है और यह मानव और मशीन के सह-अस्तित्व को परिभाषित करेगी। उन्होंने बताया कि यदि एआई पत्रकारिता का सारांश बनाने लगे, तो वह केवल सामग्री नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श में भी भाग ले रहा है। जैन ने जोर दिया कि पत्रकारिता की सामग्री इंटरनेट पर मुफ्त नहीं होती, बल्कि यह बौद्धिक संपदा है, जिसे निवेश, बुनियादी ढांचे और प्रतिभा के साथ बनाया जाता है। उन्होंने कहा कि डेटा को अनुबंधित होना चाहिए, उसे आत्मसमर्पित नहीं किया जा सकता।
* द हिंदू ग्रुप के सीईओ नवनीत एलवी ने कहा कि मीडिया में भरोसा तकनीक से नहीं, बल्कि संस्थानों से बनता है। उन्होंने प्लेटफॉर्म्स को उसी उच्च मानक के लिए जिम्मेदार ठहराने की जरूरत पर जोर दिया, जैसा पारंपरिक मीडिया के लिए होता है। एलवी ने कहा कि उनका लक्ष्य दीर्घकालिक विश्वास को प्राथमिकता देना और ऐसे राजस्व मॉडल बनाना है, जो पत्रकारिता को सार्वजनिक भलाई का माध्यम बनाए रखें।
* दैनिक भास्कर के पवन अग्रवाल ने कहा कि 2015 में भारत में असीमित डेटा पैकेज आने से फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ गया। अब एआई तकनीक हर व्यक्ति को जानकारी, सामग्री और मुफ्त डेटा के जरिए सशक्त बना रही है। उन्होंने बताया कि एआई की ताकत न्यूक्लियर पावर जैसी है। जैसे पानी साफ या गंदा हो सकता है, वैसे ही एआई का उपयोग भी जिम्मेदारी से होना चाहिए। पवन अग्रवाल ने कहा कि एआई को रोकना संभव नहीं है, इसे अपनाना और सही तरीके से इस्तेमाल करना ही सही रास्ता है।